Article 311 of the Constitution | अनुच्छेद 311 व्याख्या

यह लेख Article 311 (अनुच्छेद 311) का यथारूप संकलन है। आप इस मूल अनुच्छेद का हिन्दी और इंग्लिश दोनों संस्करण पढ़ सकते हैं। आप इसे अच्छी तरह से समझ सके इसीलिए इसकी व्याख्या भी नीचे दी गई है आप उसे जरूर पढ़ें, और MCQs भी सॉल्व करें।

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📜 अनुच्छेद 311 (Article 311) – Original

भाग 14 [संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं] अध्याय 1 – सेवाएं
311. संघ या राज्य के अधीन सिविल हैसियत में नियोजित व्यक्तियों का पदच्युत किया जाना, पद से हटाया जाना या पंक्ति में अवनत किया जाना— (1) किसी व्यक्ति को जो संघ की का या अखिल भारतीय सेवा का या राज्य की सिविल सेवा का सदस्य है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई सिंध सिविल पद धारण करता है, उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी के अधीनस्थ किसी द्वारा पदच्युत नहीं किया जाएगा या पद से नहीं हटाया जाएगा।

1[(2) यथापूर्वोक्त किसी व्यक्ति को, ऐसी जांच के पश्चात्‌ ही, जिसमें उसे अपने विरुद्ध आरोपों की सूचना दे दी गई है और उन आरोपों के संबंध में 2*** सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया है, पदच्युत किया जाएगा या पद से हटाया जाएगा या पंक्ति में अवनत किया जाएगा, अन्यथा नहीं;

3[परंतु जहां ऐसी जांच के पश्चात्‌ उस पर ऐसी कोई शास्ति अधिरोपित करने की प्रस्थापना है. वहां ऐसी शास्ति ऐसी जांच के दौरान दिए गए साक्ष्य के आधार पर अधिरोपित की जा सकेगी और ऐसे व्यक्ति को प्रस्थापित शास्ति के विषय में अभ्यावेदन करने का अवसर देना आवश्यक नहीं होगा;
परंतु यह और कि यह खंड वहां लागू नहीं होगा: ]

(क) जहां किसी व्यक्ति को ऐसे आचरण के आधार पर पदच्युत किया जाता है या पद से हटाया जाता है या पंक्ति में अवनत किया जाता है जिसके लिए आपराधिक आरोप पर उसे सिद्धदोष ठहराया गया है ; या

(ख) जहां किसी व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटाने या पंक्ति में अवनत करने के लिए सशक्त प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि किसी कारण से, जो उस प्राधिकारी द्वारा लेखबद्ध किया जाएगा, यह युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है कि ऐसी जांच की जाए; या

(ग) जहां, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि राज्य की सुरक्षा के हित में यह समीचीन नहीं है कि ऐसी जांच की जाए।

(3) यदि, यथापूर्वोक्त किसी व्यक्ति के संबंध में यह प्रश्न उठता है कि खंड (2) में निर्दिष्ट जांच करना युक्तियुक्त रूप से साध्य है या नहीं तो उस व्यक्ति को पदच्युत करने या पद हटाने या पंक्ति मैं अवनत करने के लिए सशक्त प्राधिकारी का उस पर विनिश्वय अंतिम होगा।]
=================
1. संविधान (पंद्रहहवां संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 10 द्वारा खंड (2) और खंड (3) के स्थान पर प्रतिस्थापित।
2. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 44 द्वारा (3-1-1977 से) कुछ शब्दों का लोप किया गया।
3. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 44 द्वारा (3-1-1977 से) कुछ शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

अनुच्छेद 311 हिन्दी संस्करण

Part XIV [SERVICES UNDER THE UNION AND THE STATES] CHAPTER I — SERVICES
311. Dismissal, removal or reduction in rank of persons employed in civil capacities under the Union or a State— (1) No person who is a member of a civil service of the Union or an all-India service or a civil service of a
State or holds a civil post under the Union or a State shall be dismissed or removed by an authority subordinate to that by which he was appointed.

1[(2) No such person as aforesaid shall be dismissed or removed or reduced in rank except after an inquiry in which he has been informed of the charges against him and given a reasonable opportunity of being heard in
respect of those charges 2***:

3[Provided that where it is proposed after such inquiry, to impose upon him any such penalty, such penalty may be imposed on the basis of the evidence adduced during such inquiry and it shall not be necessary to give such person any opportunity of making representation on the penalty proposed:
Provided further that this clause shall not apply—]
(a) where a person is dismissed or removed or reduced in rank on the ground of conduct which has led to his conviction on a criminal charge; or
(b) where the authority empowered to dismiss or remove a person or to reduce him in rank is satisfied that for some reason, to be recorded by that authority in writing, it is not reasonably practicable to hold such inquiry; or
(c) where the President or the Governor, as the case may be, is satisfied that in the interest of the security of the State it is not expedient to hold such inquiry.

(3) If, in respect of any such person as aforesaid, a question arises whether it is reasonably practicable to hold such inquiry as is referred to in clause (2), the decision thereon of the authority empowered to dismiss or remove such person or to reduce him in rank shall be final.]
===============
1. Subs. by the Constitution (Fifteenth Amendment) Act, 1963, s. 10, for cls. (2) and (3) (w.e.f. 5-10-1963).
2. Certain words omitted by the Constitution (Forty-second Amendment) Act, 1976, s. 44 (w.e.f. 3-1-1977).
3. Subs. by s. 44, ibid., for certain words (w.e.f. 3-1-1977).

Article 311 English Version

🔍 Article 311 Explanation in Hindi

भारतीय संविधान का भाग 14, अनुच्छेद 308 से लेकर अनुच्छेद 323 तक में विस्तारित है जैसा कि आप देख सकते हैं यह पूरा भाग संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं (SERVICES UNDER THE UNION AND THE STATES) के बारे में है। जो कि दो अध्याय में बंटा हुआ है जिसे कि आप नीचे चार्ट में देख सकते हैं;

Chapters Subject Articles
I सेवाएं (Services) 308 – 314
II लोक सेवा आयोग (Public Services Commissions) 315 – 323
Part 14 of the Constitution

इस लेख में हम पहले अध्याय “सेवाएं (Services)” के तहत आने वाले अनुच्छेद 311 को समझने वाले हैं;

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC)
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| अनुच्छेद 311 – संघ या राज्य के अधीन सिविल हैसियत में नियोजित व्यक्तियों का पदच्युत किया जाना, पद से हटाया जाना या पंक्ति में अवनत किया जाना (Dismissal, removal or reduction in rank of persons employed in civil capacities under the Union or a State)

Article 311 के तहत संघ या राज्य के अधीन सिविल हैसियत में नियोजित व्यक्तियों का पदच्युत किया जाना, पद से हटाया जाना या पंक्ति में अवनत किया जाना का वर्णन है।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 311 भारत संघ या राज्य सरकार के तहत सेवारत सिविल सेवक की बर्खास्तगी, वापसी या रैंक में कमी से संबंधित नियमों से संबंधित है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 का उद्देश्य नौकरी की सुरक्षा की रक्षा करना और सिविल सेवा पदों पर सेवारत व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करना है। इस अनुच्छेद के तहत कुल तीन खंड आते हैं;

अनुच्छेद 311 के खंड (1) तहत कहा गया है कि किसी व्यक्ति को जो संघ की का या अखिल भारतीय सेवा का या राज्य की सिविल सेवा का सदस्य है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई सिंध सिविल पद धारण करता है, उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी के अधीनस्थ किसी द्वारा पदच्युत नहीं किया जाएगा या पद से नहीं हटाया जाएगा।

अनुच्छेद 310 और 311 इस सिद्धांत में कोई परिवर्तन नहीं करता है कि सरकारी सेवक, यथास्थिति राष्ट्रपति या राज्यपाल के प्रसाद्पर्यंत पद धारण करता है। अनुच्छेद 311 यह कहता है कि इस प्रावधान का उपयोग उस अनुच्छेद में शर्तों के अधीन होगा।

कहने का अर्थ यह है कि अनुच्छेद 311 के उपबंध सिविल पद धारण करने वाले व्यक्तियों के संबंध में अनुच्छेद 310(1) के परंतुक के रूप में काम करता है।

इसमें कहा गया है कि संघ की सिविल सेवा, अखिल भारतीय सेवा, किसी राज्य की सिविल सेवा, या संघ या राज्य के अधीन सिविल सेवा में किसी को भी उसे काम पर रखने वाले के अधीनस्थ किसी भी प्राधिकारी द्वारा बर्खास्त नहीं लिया जाएगा, या पद से नहीं हटाया जाएगा।

कहने का अर्थ है कि नियुक्त करने वाले प्राधिकारी से पंक्ति में अधीनस्थ किसी प्राधिकारी द्वारा की गई पदच्युति शून्य होगी। यदि किसी नियम में पदच्युत करने की शक्ति नियुक्त प्राधिकारी के अधीनस्थ प्राधिकारी को दी जाती है तो ऐसा नियम शून्य होगा।

अनुच्छेद 311 के खंड (2) तहत कहा गया है कि पहले उल्लिखित कोई भी व्यक्ति तब तक बर्खास्तगी, निष्कासन या रैंक में कटौती के अधीन नहीं होगा जब तक कि कोई जांच न हो जिसमें उन्हें उनके खिलाफ आरोपों के बारे में सूचित किया गया हो और उन आरोपों का जवाब देने का उचित मौका प्रदान किया गया हो।

हालांकि यहां यह याद रखें कि जहां उपरोक्त जांच के पश्चात्‌ उस व्यक्ति पर ऐसी कोई शास्ति (penalty) अधिरोपित करने की प्रस्ताव है. वहां ऐसी पेनाल्टी ऐसी जांच के दौरान दिए गए साक्ष्य के आधार पर अधिरोपित की जा सकेगी और ऐसे व्यक्ति को प्रस्थापित पेनाल्टी के विषय में अभ्यावेदन करने का अवसर देना आवश्यक नहीं होगा;

लेकिन यहां पर यह याद रखिए कि यह जो जांच वाला मामला है यह खंड 3 मामलों में लागू नहीं होता है;

पहला) जहां किसी व्यक्ति को ऐसे आचरण के आधार पर पदच्युत किया जाता है या पद से हटाया जाता है जिसके लिए आपराधिक आरोप पर उसे सिद्धदोष ठहराया गया है ; या,

दूसरा) जहां किसी व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटाने के लिए सशक्त प्राधिकारी को यह लगता है कि उस कारण से, (जो उस प्राधिकारी द्वारा लेखबद्ध किया जाएगा), यह युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है कि ऐसी जांच की जाए; या

तीसरा) जहां, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि राज्य की सुरक्षा के हित में यह उचित नहीं है कि ऐसी जांच की जाए।

अनुच्छेद 311 के खंड (3) तहत कहा गया है कि यदि उपरोक्त पदों पर किसी व्यक्ति के लिए खंड (2) में उल्लिखित जांच आयोजित करने की व्यवहार्यता के बारे में अनिश्चितता है, तो इस मामले पर अंतिम निर्णय उस व्यक्ति को पद से हटाने का अधिकार रखने वाले प्राधिकारी के पास होगा।

इस अनुच्छेद के तहत दो महत्वपूर्ण टर्म्स है जिसे कि समझना जरूरी है; 1) पदच्युत किया जाना (Dismissal), 2) पद से हटाया जाना या पंक्ति में अवनत किया जाना (removal or reduction in rank)

पदच्युत किया जाना (Dismissal) का मतलब गंभीर कदाचार या अक्षमता के कारण किसी कर्मचारी की सरकारी पद से बर्खास्त करना है। यह अनुशासनात्मक कार्रवाई अक्सर तब होता है जब किसी कर्मचारी ने विशिष्ट नियमों, विनियमों या आचरण के मानकों का उल्लंघन किया है। जैसे कि धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, उत्पीड़न, अवज्ञा, या अनैतिक व्यवहार इत्यादि।

जैसा कि हमने ऊपर समझा कि बर्खास्तगी प्रक्रिया में आमतौर पर गहन जांच शामिल होती है, जिसके दौरान आरोपी कर्मचारी को अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।

जांच प्राधिकारी, जैसे कि विभागीय जांच समिति या अनुशासनात्मक बोर्ड, साक्ष्य की समीक्षा करता है और कर्मचारी को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का उचित मौका प्रदान किया जाता है। यदि कर्मचारी दोषी पाया जाता है, तो अनुशासनात्मक कार्यवाही के परिणामस्वरूप उन्हें बर्खास्तगी का सामना करना पड़ सकता है।

जब किसी कर्मचारी को बर्खास्त किया जाता है, तो यह उनके नौकरी के अनुबंध की समाप्ति को दर्शाता है। यानि कि वह व्यक्ति अपनी नौकरी के साथ-साथ उससे जुड़े लाभ और विशेषाधिकार भी खो देते हैं।

पद से हटाया जाना या निष्कासन (removal) का तात्पर्य कदाचार के अलावा अन्य कारणों से सरकारी कर्मचारी की सेवाओं की समाप्ति से है।

यह आम तौर पर गैर-अनुशासनात्मक कारकों जैसे नौकरी, संगठनात्मक पुनर्गठन, या प्रदर्शन-संबंधित मुद्दों के कारण होता है जिनमें गंभीर कदाचार शामिल नहीं होता है।

यदि कोई कर्मचारी आवश्यक प्रदर्शन मानकों को पूरा करने में विफल रहता है या अपने कार्य कर्तव्यों में लगातार अक्षमता या अक्षमता प्रदर्शित करता है तो निष्कासन भी हो सकता है।

बर्खास्तगी के विपरीत, निष्कासन आमतौर पर उचित प्रक्रिया का पालन करने और यह सुनिश्चित करने के बाद किया जाता है कि कर्मचारी को निर्णय में सुधार करने या उसका विरोध करने का उचित मौका दिया गया है। इस प्रक्रिया में परामर्श, प्रदर्शन सुधार योजना, प्रशिक्षण, या संगठन के भीतर एक अलग भूमिका में पुन: असाइनमेंट शामिल हो सकता है।

हालाँकि, यदि इन प्रयासों के बावजूद प्रदर्शन या आचरण संबंधी समस्याएं बनी रहती हैं, तो निष्कासन को अंतिम उपाय माना जा सकता है।

कुल मिलाकर, यदि किसी व्यक्ति को बर्खास्त कर दिया जाता है तो उसे भविष्य में काम करने से प्रतिबंधित कर दिया जाता है, लेकिन अगर उसे हटा दिया जाता है तो उसे भविष्य में काम करने से प्रतिबंधित नहीं किया जाता है।

◾ जहां तक सवाल पंक्ति में अवनत (Reduction in Rank) का है तो “रैंक में कमी” का तात्पर्य किसी रैंक या कैडर के भीतर अपना स्थान खोने के विपरीत, उच्च पद या पोस्ट से निचले पद पर पदावनति (demotion) करना है।

तो यही है अनुच्छेद 311 , उम्मीद है आपको समझ में आया होगा। दूसरे अनुच्छेदों को समझने के लिए नीचे दिए गए लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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Question 1: Article 311 of the Indian Constitution deals with:

(a) The recruitment and conditions of service of persons serving the Union or the State
(b) The power of the Union Government to levy taxes on goods and services
(c) The power of the State Governments to levy surcharges on the taxes levied by the Union Government
(d) The dismissal, removal, or reduction in rank of persons employed in civil capacities under the Union or a State




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Answer: (d) Explanation: Article 311 of the Indian Constitution deals with the dismissal, removal, or reduction in rank of persons employed in civil capacities under the Union or a State. It provides certain safeguards to these persons against arbitrary dismissal or reduction in rank.


Question 2: Article 311(1) of the Indian Constitution states that no person who is a member of a civil service of the Union or an all-India service or a civil service of a State or holds a civil post under the Union or a State shall be dismissed or removed by an authority subordinate to that by which he was appointed.

True
False




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Answer: True


Question 4: The exceptions to the requirement of a hearing under Article 311(2) of the Indian Constitution are:

(a) Cases where the President or Governor is satisfied that in the interest of the security of the State it is not expedient to give to that person such an opportunity.
(b) Cases where the person concerned is removed from a post which is not held in connection with a civil service of the Union or a State.
(c) Cases where the person concerned is dismissed or removed from a post which is held in connection with a civil service of the Union or a State on charges of corruption or other misconduct. (d) All of the above




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Answer: (d) Explanation: All of the above are exceptions to the requirement of a hearing under Article 311(2) of the Indian Constitution.


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अनुच्छेद 312 – भारतीय संविधान
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Next and Previous to Article 311
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अस्वीकरण – यहाँ प्रस्तुत अनुच्छेद और उसकी व्याख्या, मूल संविधान (उपलब्ध संस्करण), संविधान पर डी डी बसु की व्याख्या (मुख्य रूप से), प्रमुख पुस्तकें (एम. लक्ष्मीकान्त, सुभाष कश्यप, विद्युत चक्रवर्ती, प्रमोद अग्रवाल इत्यादि) एनसाइक्लोपीडिया, संबंधित मूल अधिनियम और संविधान के विभिन्न ज्ञाताओं (जिनके लेख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर ऑडियो-विजुअल्स के रूप में उपलब्ध है) पर आधारित है। हमने बस इसे रोचक और आसानी से समझने योग्य बनाने का प्रयास किया है।